पर्यावरण दिवस के मायने

 

नमिता बिष्ट

हमारे चारों ओर की प्रकृति ही हमारा पर्यावरण है।यानि वह सब कुछ जो हम अपने चारो ओर देखते है। आदिकाल से ही मानव और पर्यावरण का गहरा रिश्ता रहा है।जन्म से लेकर मृत्यु तक की प्रक्रिया प्रकृति से जुडी है। भारत में अनादिकाल से प्रकृति की पूजा करते आए है। जिस कारण पर्यावरण के प्रति जागरुक प्राचीन मानव समाज तो शुरु से रहा है। हमारा पर्यावरण हजारो वर्षो से हमें और अन्य प्रकार के जीवो को धरती पर बढने, विकसीत होने और पनपने में मदद कर रहा है। जोहमारे लिए स्वस्थ और खुशहाल जीवन का आधार है।लेकिन आज दिन प्रतिदिन पर्यावरण पर संकट गहराता जा रहा है। भारतएकऐसाविकासशीलदेशहै।जिसमेंविकास के लिए प्राकृतिक संसाधनो के दोहन का जो सिलसिला शुरु हुआ वह आज तक जारी है।पिछले कुछ दशको से इसमेंज्यादा बदलाव आया है। जब विज्ञान के उपयोग से नए आविष्कार होने लगे और फिर औद्योगिक क्रांति ने तो मानव जीवन की दिशा ही बदल डाली। लेकिन इऩ्ही उपलब्धियो के बीच सबसे घातक काम था- प्रकृति के साथ खिलवाड।

विकास की दौड़ में प्रकृति का अंधाधुंध दोहन

आज बेहिसाब जनसंख्या बढ़ती जा रही है।जहांभीशहरफैलेहै।पारिस्थितिकीऔरपर्यावरण को नुकसान पहुंचा है। कारखानो, मकानो और अन्य संस्थानो के लिए जमीन की जरुरत को पूरा करने के लिए प्राकृतिक आयामो को काट छॉट कर समतल किया गया है।लेकिनहमनेविकासकेसाथपारिस्थितिकसन्तुलनकाकुछभीध्याननहीरहाहै।जिसकापरिणामआजपर्यावरणप्रदूषणजैसीसमस्याकाजन्महोरहाहै।आज भारत सहित पूरा विश्व पर्यावरण प्रदूषण से परेशान है। जिस हवा में हम सांस ले रहे है, उसमें विषैली गैसे घुलती जा रही है। हमारी प्रगति ने हमारी आबोहवा को बदल दिया है।औद्योगिककारखाने वायुमंडल में विषैला धुआं उगल रहे है और नदियो के निर्मल जल को नापाक कर रहे है।शहरो में पैदा होने वाले बेहिसाब कचरे और गंदगी से पानी और हवा प्रदूषित हुई है। मौजूदा समय में वायु प्रदूषण इतना बढ चुका है कि सांस लेने के लिए साफ हवा का मिलना बेहद मुश्किल है।हम कई विषैली गैसो के साथ कई बीमारीयो की चपेट में आ रहे है।जिन्दगी की डोर आती जाती सांसो पर टिकी होती है और सांसो का आधार होता है – ऑक्सीजन । जो हमें पेड पौधो से मिलती है। पेड मानव जाति के लिए वरदान है। जो कार्बन डाई ऑक्साइड लेते है और हमारे लिए ऑक्सीजन को छोडते है। लेकिन आज शहरीकरण के लिए हर दिन हजारो पेड काटे जा रहे है। जिससे प्रकृति का दोहन चरम पर पहुंच गया है। पर्यावरण की अवमानना आधुनिक युग में इतनी प्रबल है किआज प्रकृति में मौजूद जीवधारीयो की तमाम जातियो के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। कई जातियो के जीव विलुप्त हो चुके है। इसके साथ ही सदानीरा नदियां नालो में बदलने लगी है। औरभूमि का दोहन करते- करते उसकी उर्वराशक्ति खत्म होती जा रही है। भू- जल के भंडार भी सूखने लगे है। जिसके जिम्मेदार भी हम खुद है। गांधी जी ने कहा था –“ पृथ्वी हमे अपनी जरुरतो को पूरे करने के लिए सभी प्रकार के साधन प्रदान करती है, परन्तु लालच को पूरा करने के लिए नही”। लेकिन आज हम विकास की दौड में इस तरह भाग रहे है, हम भूल गए कि हम वनो का सफाया करके धरती की गोद में विष के बीज बो रहे है।यानि विकास की दौड़ में स्वंय हमने न केवल प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है, बल्कि उसे बुरी तरह प्रदूषित भी कर दिया है। सच्चाई तो यह है कि हमारे पास जो कुछ भी है। वह हमें प्रकृति ने ही दिया है। और प्रकृति केवल यह चाहती है कि हम उपभोग के बजाय उसका सरंक्षण करे।

पर्यावरण प्रत्यक्षीकरण का प्रतीक चिपको आंदोलन

आज चारो ओर कटते हुए पेडो और उजडते वनो को देख कर भला कोई इस बात पर विश्वास कर सकेगा कि कभी लोगो ने इन पेडो के लिएबंदूक और कुल्हाडियो का सामना किया था। उत्तराखण्ड़ गढ़वाल क्षेत्र में जन्मा चिपको आंदोलन वृक्षो के प्रति बढ़ती नई चेतना और पर्यावरण प्रत्यक्षीकरण का एक प्रतीक है। 1974 में रैणी गांव की साहसी मां बहिनो ने हजारो पेडो को कटने से बचाया था। आजगौरा देवी और अन्य मां बहिने वृक्षो को बचाने के कारण किवदंती बन गई है।दुनिया भर में उन का यह साहस जंगल, धरती, वर्षा, पानी और बयार के अट्टू रिश्ते के बारे में लोगो को सोचने के लिए मजबूर कर गया। भारतीय संविधान के मूल अधिकारो में भी पर्यावरण को अप्रत्यक्ष रुप से समाहित किया गया है जो स्पष्ट रूप से पर्यावरण संरक्षण का उपबंध करता है- “ भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे।“ लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आज हम सच में अपने इस कर्तव्य को निभा रहे है? सचमुच कितनी विडंबना है। विशाल सौरमडंल के केवल हमारे इस छोटे से ग्रह में जीवन का स्पंदन हो रहा है और हम उस जीवन के विनाश का सामान जुटा रहे है।

पर्यावरण चक्र में अनियमित परिवर्तन

प्रकृति के दोहन, कूडे कचरे के प्रवाह, वनो की कटौती, जहरीली गैसो के प्रभाव से पूरा परिस्थितिकी तंत्र ही संकट में है।जिसके परिणामस्वरूप न सिर्फ जल, थल और वायु प्रदूषण बढा है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग बढने से ग्लेशियर पिघलने और समुद्र के जलस्तर में बढोतरी जैसी समस्याएं भी अपना विकराल रुप दिखा रही है। आज चक्रवाती तूफान भी बढते वैश्विक तापमान जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है।वैचारिक और सांस्कृतिक प्रदूषण हमारे आंतरिक पर्यावरण को और प्रकृति का दोहन हमारे वाह्य पर्यावरण को नष्ट कर रहा है। जिससे मनुष्य और प्रकृति के बीच का संतुलन बिगडता जा रहा है। मनुष्य के अंधाधुंध भैतिक, रासायनिक प्रयोगो और दोहन के कारण पर्यावरण चक्र में अनेक अनियमित परिवर्तन देखने को मिल रहे है।यही कारण हे कि आज प्राकृतिक आपदाएं भी तेजी से दस्तक दे रही है। इस साल पूरी दुनिया मे बेमौसम बारिश का आंकडा सबसे ज्यादा बढा है।

पर्यावरण का संरक्षण जरुरी

पिछले कुछ दशको को हमने अपनी सुख सुविधाओ के लिए बहुत सारी चीजो का विकास किया है, लेकिन कई अहम पहलुओ को नजर अंदाज भी कर दिया। जिसका समाधान आवश्यक है।किन्तुइससमस्याकासमाधानराजनीतिज्ञो, नीति- नियामको, अधिनियमोमेंनिहितनहीहै।इसकेलिय़ेआवश्यकताहैजनजागरुकताकी।आवश्यकहैकिप्रत्येकदेशवासीहरे- भरेभारतकासपनादेखतेहुएअपनेनिकटतमवातावरणकीस्वच्छताकाबोझउठानेकोतैयाररहे। सभी प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए जरुरत सभी कदम उठाने होगे। हमे जल सरंक्षण पर भी ध्यान देना होगा। जिससे आने वाले समय में पानी की कमी न हो। मानव- विकास प्रक्रिया में स्वच्छ वातावरण की एक गंभीर और अनिवार्य भूमिका है। हमे अपनी भावी पीढी के लिए पेड लगाने और बचाने होगे। यदिपर्यावरणप्रदूषणकीसमस्याकोहमनेउत्पन्नकियाहैतोपर्यावरणकीसुरक्षाकाउत्तरदायित्वभीहमसबकोअपनेकंधोपरलेनाहोगा।इससबकेलिएआत्मचेतनावजगचेतनाजगानेकीआवश्यकताहै। प्रत्येकव्यक्तिकोवृक्षोकेप्रहरीकेरुपमेंकार्यकरनाहोगा। प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग संयुक्त वातावरण में सकारात्मक बदलावो को लाने के लिए प्रयास करना होगा। साथ ही पर्यावरण का संरक्षण करना होगा ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियो को विरासत एक रहने और जीने लायक दुनिया दे सकें।

विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम – जैव विविधता

प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर जागरुकता फैलाने के लिए हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।इसकी शुरुआत 1972 में मानव पर्यावरण पर आयोजितसंयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान हुई थी। जिसमें लगभग 100 से अधिक देशो ने हिस्सा लिया था। लेकिन इस कार्यक्रम को हर साल मनाने की शुरुआत 1973 से हुई। जिसका लक्ष्य पूरे विश्व में मानवीय पर्यावरण का संरक्षण और विकास करना था साथ ही मानव जीवन में हरित पर्यावरण के महत्व के बारे में सकारात्मक जागरुकता फैलाना था। इसका वार्षिक कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र के द्वारा घोषित की गई विशेष थीम पर आधारित होता है। इस बार विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम –“जैव विविधता” रखा गया है। जिसे “प्रकृति के लिएसमय” ( Time for Nature ) विचार के साथ मनाया जायेगा। जिसका उद्देश्य पृथ्वी और मानव विकास पर जीवन का समर्थन करने वाले आवश्यक बुनियादी ढ़ांचे को प्रदान करने पर ध्यान देना है। इस बार 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर यह कार्यक्रम जर्मनी की साझेदारी में कोलंबिया में आयोजित होना है।