दवा विक्रेताओं की मुनाफे की लडाई में आम मरीज परेसान.

                 //भानु प्रकाश नेगी, देहरादून// 
दवा विक्रेताओं की देशव्यापी हड़ताल के चलते जरूरी दवाओं के लिए मरीजों को दिन भर भटकना पडा, देश के कई कोनों से आयी खबरों के अनुसार जरूरी दवा न मिलने के कारण जान तक गवानी पडी है,वही देश भर में दवाई की दुकानों बंद रहने से अरबों रूपये के कारोबार का नुकासान भी हुआ है।
ई-फार्मेसी की मान्यता देने वाले कानून के खिलाफ दवा कारोबारियों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ देश भर में प्रर्दशन कर जमकर नारेबाजी की एसोशिएसन ने सरकार पर आरोप लगाया कि बार-बार चेताने बाद भी हमारी मांगे नही मानी जा रही थी जिससे हमें मजबूरन हडताल पर जाना पडा है। उन्होंने बताया कि इस कानून लागू होने से न केवल दवा व्यवसायी का नुकसान है, बल्कि ऑनलाइन दवा बिक्री में नियमों का भी धड़ल्ले से दुरूपयोग किया जा रहा है।


जानकारों के अनुसार ऑनलाइन पोर्टल पर दवा के बिक्री होने से दवा माफियाओं और फर्जी रजिस्ट्रेसन कर दवाओं के कारोबार करने वाले दलालों को भारी नुकसान होगा इसलिए ये ई-फार्मेसी को मान्यता देने वाले कानून को पास नही होने देना चाहते है।साथ ही इससे सीधे तौर फायदा मरीजों को होगा जिन्हें ब्राण्डेड व जैनरिक दवायें सस्ते रेट में बिना समय गवायें मिल सकेगी। वही विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है केन्द्र सरकार की यह निर्णय निश्चित तौर पर जनहित में है। एमपीटी किट,सिडलेफिल कोडीन जैसी दवायें कोई भी डॉक्टर पर्चे पर नही लिखता है इन दवाओं को विक्रेता छुप छुपकर मनमाने रेटों पर बेचते है और मोटा मुनाफा कमाते है। जिसका वह न तो बिल देते है और न ही कोई लेखा जोखा रखते है।मनोचिकित्सक,त्वचा रोग विशेषज्ञ और अन्य विशेषज्ञों के पचे पर लिखी जाने वाली दवाओं गैर योग्यता प्राप्त डॉक्टरों के पर्चे पर खरीदे जाने की बात को खुद डॉक्टर नकारते है उनका कहना है कि यह बात निराधार है क्योंकि मनोरोग आदि की दवा फर्जी तरीके से अन्य पर्चो पर नही लिखी जा सकती है।दवाओं की बिक्री पुराने पर्चे या फिर बनावटी पर्चे पर की जाने की बात को भी डॉक्टर सिरे से नकारते है उनका कहना है कि दवा पुराने पर्चे पर हो या नये लिखी तो विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ही होती है



ई-फार्मेसी कानून का विरोध करने वाले एसोसिएसन ने भले ही अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आये हो लेकिन इस कानून के लागू होने से आम आदमी को ड्रग माफियों की अंधी लूट से कुछ हद तक छुटकारा मिल पायेगा, क्योंकि अधिकतर दवाओं को उसकी असल कीमत से कई गुना रेटों में बेचा जाता है जिसमें दवा बनाने वाली कम्पनी से लेकर दवा लिखने वाले डॉक्टरों का मोटा कमीशन होता है। जो अक्सर आम आदमी की जान ले लेता है। आम आदमी का भी यही कहना है कि यह कानून समय की डिमांड है। आज के सूचना तकनीकी के जमाने में जब दैनिक उपयोग की दर चीजें ऑनलाईन से मंगायी जा सकती है जो जीवन रक्षक दवाओं को क्यों इससे बंचित रखा जाय और ऑनलाईन मंगाने से जब मुनाफे के साथ-साथ समय की भी बचत होती हो तो इसका विरोध क्यों? आम जनता का कहना है कि दवा कारोबारी इस कानून का विरोध इसलिए कर रहे है कि वह फर्जी तरीके से मरीजों को लूट नही सकेगें क्योकि ऑनलाईन पोर्टल पर दवाओं की कीमतें सार्वजनिक तौर पर लिखी होती है।बहरहाल यह विवाद कहा जाकर खत्म होगा यह कहना अभी मुस्किल होगा लेकिन ऑनलाईन दवाओं की बिक्री का आम जन स्वागत कर रहे है।