भगवान तो नही पर भगवान से कम नही हो तुम……“डॉक्टर डे“ स्पेशल

   //भानु प्रकाश नेगी//

समाज सेवा का दूसरा नाम है डॉक्टारी पेशा।
– डॉक्टर डे पर सभी डॉक्टरों को बधाई एवं शुभकामनायें।

डॉक्टर को भगवान के दूसरे रूप में देखा जाता है,और देखना भी लाजमी है क्यांकि वह हमारे बीमार शरीर की छोटे-मोटी पीडा से लेकर जानलेवा बीमारियों से हमें बचाता है। बुरे बक्त में इन्सान दो ही नामों का स्मरण करता है जिसमें पहला भगवान और दूसरा डॉक्टर होता है। डॉक्टर हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण होते है इस बात की महत्ता सभी को पता है। कम से कम पांच साल की गहन पढाई व कठिन प्रशिक्षण प्राप्त कर कोई इंसान डॉक्टर बनता है तो वह इंसान लिए देवदूत बनकर धरती में उतरता है। सेवा, सर्मपण और त्याग को आधार दिनचर्या बनाकर उसे अपने करियर की शुरवात करनी होती है।साल दर साल के अनुभवों के बाद ही वह कुसल चिकित्सक बन पाता है।
विकट भौगोंलिक परिस्थतियों वाले भू-भाग उत्तराखंड के परिपेक्ष में डॉक्टरों की भूमिका काफी संवेदनशील हो जाती है।यह राज्य के नीति नियंताओं पर गंभीर प्रश्न चिन्ह है कि यहां राज्य निमार्ण के 17 सालों बाद भी अस्पताल रेफर सेंटर बने हुये है, राज्य में एक भी सरकारी अस्पताल ऐसा नही है जंहा सभी प्रकार के मरीजों को संम्पूर्ण उपचार मिल सकें। उत्तराखंड राज्य निमार्ण के बाद भौतिक सुख सुविधाओं और रोजगार की तलास में तेजी से हुये पलायन ने पर्वतीय जिलों हालत दयनीय कर दी आवादी ना के बराबर रह गई।

“डॉक्टर डे“ पर डॉं पुनेठा का कहना है कि यह पेशा मानवीय संवेदनाओं को गहराई से समझने का है क्यांकि हम पर समाज की बहुत बडी जिम्मेदारी है,इसीलिए डाक्टरों को किसी भी समय मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहना पढता है ताकि पीड़ित को जीवन दान दिया जा सकें। पहाडों में सेवा के लिए उन्होनें डॉक्टर मित्रों से अपील की है कि वह बहुत सुख सुविघा की चाहत को छोड पहाड के लोगों को अपनी सेवा दे ताकि सही मायने में डॉक्टरी पेसा का फर्ज निभाया जा सकें।इस मौके पर उन्हानें सभी डॉक्टर मित्रों को बधाई व शुभकामनायें देते हुये जनहित में सोचने की अपील की।
गौरतलब है कारोनेसन अस्पताल के मुख्य चिकित्साधिकारी वरिष्ठ सर्जन डॉं एल सी पुनेठा जितने अनुभवी डॉक्टर है उससे भी कई अधिक मृदु व्यवहार,मेहनती,लगनशील,ईमानदार व मानवीय संवेदनाओं को गहराई से समझने वाले इंसान है। कभी रेफर सेंटर बन चुके कोरोनेशन अस्पताल को भारत सरकार ने लगातार दो बार कायाकल्प के पुरस्कार से नवाजा है। उनकी कार्य शैली का ही परिणाम है कि वर्तमान समय में अस्पताल में लगभग हर प्रकार के रोगों के डॉक्टर व जांच मशीनें उपलब्ध है।और यहां रोजाना ओपीडी 1000 से उपर पंहुच जाती है। इतना ही नही कोरोनेसन अस्पताल में मरीजों को इलाज के अलावा विभिन्न स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से गंम्भीर रोगों के बारे में जानकारी व जांच की सुविधायें तथा परामर्श मुक्त में देने का श्रेय भी इन्ही को जाता है।

बरिष्ठ फीजिसियन डॉ एनएस बिष्ट “डॉक्टर डे“ पर अपनी शब्दों को बयां करते हुये लिखते है।,
आज मैने अपने दिल में हाथ डाला और अंजुलिभर लहु निकालकर उसमें अपना चेहरा देखा, यह जानने के लिए नही कि मै कितना साफ दिखता हूं,बल्कि यह परखने के लिए कि मेरा खून कितना बजनी और लाल है, और खुद को याद दिलाने के लिए कि कुछ भी कर लो “सोने में आक्सीजन लेने की क्षमता नही होती“।

 
डॉक्टर डे पर उन्होने बधाई इन शब्दों में बधाई दी- लिवर टॉनिक के तीस प्रतिसत कमीसन वाले नहीं,शत प्रतिशत जिगर के आइकोनिक डाक्टर्स को हप्पी डॉक्टर डे।
अपने बेकाक अंदाज के लिए प्रसिद्व डॉ नंदन सिंह बिष्ट का नजरिया इस पेसे को लेकर कुछ अलग है उनका कहना है कि हर वह इंसान जिसके पास शरीर है वह डॉक्टर है, पहाडों में डॉक्टरों के आभाव का कारण राज्य की राजधानी का पहाड में न होना है।राजधानी का केन्द्र बिन्दु बीच में न होने के कारण इस समस्या का जन्म हुआ है वरना उत्तर प्रदेश के समय में पहाडों में डाक्टर अपनी सेवा बराबर दिया करते थे। पलायन के कारण आवादी कम होने से डॉक्टर का मन भी पहाडों की ओर जाने का कम है। डॉं. बिष्ट का स्पस्ट तौर पर कहना है कि पहाडों को सहासिक पर्यटन का हब बनाना होगा आवादी बडने पर डॉक्टर खुद ही पहाडों की ओर रूख करेगा जिससे आम जनता का भी भला हो सकेगा। मानवीय संवेदनाओं व सेवाभाव से सभी डॉक्टरों मित्रों को पहाड के लिए विशेष रूप से सोचने की आवश्यकता है।

कोरोनेशन अस्पताल के वरिष्ठ फिजिसीयन व समाजसेवी डॉ.अजीत गौराला डॉक्टर मित्रों़ को बधाई देते हुये कहते है कि हम आगे बडे लेकिन कहां बडे किस रूप में बडे यह सोचने की आवश्यकता है।स्वास्थ्य के प्रति सरकारों की पॉलसी प्रायवेट हेल्थ सेटरों को मध्य नजर रख कर की जा रही है,जिसके कारण पैराहेल्थ सेंटर लगभग पांच साल में प्रायवेट में चले जायेगें। आज के दिन डॉक्टरों को गांव की ओर रूख करने का संकल्प लेंना चाहिए क्योकि यदि डॉक्टर बने है तो जनता को सेवा देनी ही होगी तभी हम असली में डॉक्टर कहलाने के हकदार है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलां में अभी भी स्वास्थ्य सेवायें इतनी लाचार और बीमार है कि, एक गरीब आदमी अगर बीमार हो जाता तो उसे अपना एक खेत बेचकर अपना इलाज कराना पढता है। सिर्फ अच्छा वेतन देने से डॉक्टर पहाड नही चढेगा, बल्कि अच्छे कामकाजी माहौल होने और अच्छी नीति बनने पर ही डॉक्टर पहाड़ चडेगें। नये डॉक्टरों को आवश्यक किया जाय कि जब आप पहाडों में कम से कम अपनी दो साल की सेवा का प्रमाण पत्र दोगे तभी आपको पीजी की डिग्री मान्य होगी,तब जाकर स्थिति में सुधार हो सकता है।


गौरतलब है कि डॉ अजीत अपनी सेवा के अतिरिक्त राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन,तम्बाकू निवारण,ब्रस्ट कैन्सर उन्मूलन आदि कार्यक्रम में कई सालों से अपनी निशुल्क सेवा विभिन्न स्थानों पर खुद के संसाधनों से निःशुल्क और निःस्वार्स्थ भाव से दे रहे है। जिससे सैकडों लागों की गम्भीर रागों(कैन्सर,टीबी,दमा)से जान बच चुकी है। इनका कहना है कि अपने लिए तो जानवर भी जी है,वो इंसान ही क्या जो लाचार,बीमार,और बेबस की सेवा न कर सकें। मृदुभाषी और मानवीय संवेदनाओं को गंम्भीरता से समझने वाले डॉ अजीत गैरोला समाज में अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुये है।

बहरहाल आज के दिन डॉक्टरों को सुविधा असुविधाओं को दरकिनार कर मानवीय संवेदनओं और सेवाभाव अपनी जिम्मेदारी के बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। यूं तो पूरा भारत वर्ष में डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा और उसमें भी अनुभवी व विशेषज्ञता हासिल करने वाले डॉक्टरों का भारी टोटा देखने को मिला है। लेकिन उत्तराखंड के परिपेक्ष मे यह स्थिति काफी गंभीर नजर आ रही है,सरकार को ठोस नीति बनाकर न सिर्फ डॉक्टरों को पहाड भेजना होगा बल्कि अस्पतालों में आवश्यक उपकरण व सहायक कर्मचारियां की भर्ती करने की आवश्यकता है तभी सही मायने में उत्तराखंड की चिकित्सा व्यवस्था का पटरी पर चल पायेगी।