डाॅक्टर एन.एस. बिष्ट की IMA अध्यक्ष डाॅ. गोयल के नाम खुली चिट्ठी।

 

I M A अध्यक्ष के नाम खुली चिट्ठी

माननीय डाॅ गोयल
समाचार पत्र में छपी आपकी भर्त्सना का उत्तर लिखते हुए मुझे कतई हर्ष नहीं हो रहा है।मेरे लिए यह फिर से” एक डाॅक्टर की मौत” देखने जैसा है।
डाॅक्टर कब मरा? कैसे मरा?मरता तो एक रोगी है।मरना तो रोग को था। तब क्या फ्रेडरिक नीचा की “भगवान मर चुका है” कि घोषणा के डेढ़ सौ साल बाद हम उसी उल्कानुमा आश्चर्य की दहलीज पर आ खड़े हैं?
किसी आरोप की भर्त्सना करना सरल है।आरोप मढना उससे भी आसान।

मै बक गया वक्तव्य दे दिया कि डाॅक्टर मर चुका है।आपकी तरफ से जवाब आया- एकदम गलत – डाॅक्टर अपने मानवीय चेहरे के साथ अपने चैम्बर में विराजमान है।
तथास्तु!

मै ही भ्रमित हूॅ।बौरा गया हूॅ।जब सभी के सभी सूरज की रोशनी में नहा रहे थे-मुझे किसी और तारे की रोशनी की तरफ इशारा नहीं करना चाहिए था।जब खून निकाल कर,खून चढ़ाने वाले थियेटर हर गली मौहल्ले में सजे हों,मुझे आला पहनकर सफेद कोट पर पान नहीं थूकना चाहिए था।मुझे शायद जिन्दा और मुर्दे का फर्क नहीं पता क्योंकि में “आशुतोष भगवान” का भक्त नहीं ।मै सनकी हूॅ, जो मैंने कह दिया कि डाॅक्टर मर चुका है,गल चुका है,सड़ चुका है।
और उसकी जगह डाॅ. यम बैठा है।
उसे खून चाहिए
हर चौराहे की हर पान की दुकान के आगे पीछे अगल -बगल वो चहलकदमी कर रहा है।डाॅक्टर डेथ को जिंन्दगी चाहिए।अपना पेट भरने के लिए, खुद को जिन्दा रखने के लिए।
डाॅ.डेथ एक ही मारन्तक रोग से खुश नहीं होते-एक साथ डेंगू-मलेरिया-टाईफाईड-पीलिया कई-कई बीमारियों का डाईग्नोसिस बनाते हैं बहु आयामी निदान करते हैं।
मै माफी मांगना चाहता हूॅ- शहर के अवैध अश्लील लैब संचालकों से, विदेश में रहकर सरकारी अस्पताल के सामने मैट्रिक फेल सैम्पल चूसने वाले रक्तहरों के माध्यम से लैब चलाने वालों से।
मैं पत्तछाप हकीमों, फूलछाप गदहों,जड़ीछाप विशेषज्ञों का भी क्षमाप्रार्थी हूॅ जो डेंगू, मलेरिया,स्वाईन फ्लू को चुटकी बजाकर ठीक करने की शक्ति रखते हैं।
दुनियां में सूरज ही मुबारक है। मुबारक रहे।मेरे देखे तारे की टिमटिमाहट मेरे मरे हुये डाॅक्टर को मुबारक।
क्योंकि जैसा कि आपने कहा, आप सोचते हैं या जानते हैं डाॅक्टर मानवीय है “डाॅक्टर जिन्दा है” डाॅक्टर को मसालों का सैनिटरी लेप लगा है।डाॅक्टर मर नहीं सकता।
हवाला दिया गया है कि
गलती से भी दफनायें या जलायें नहीं ।सच को ममी की तरह संरक्षित रखा जाता है।

अंत में एक बार पुनः मैं उन लोगों से क्षमायाचना करता हूॅ जिनके हाथ खून से रंगे होने की गंदी घोषणा मैंने की।असल में खून तो मशीनों को चाहिये चलने के लिए।
मनुष्य तो रक्तमोक्ष है।
और डाॅक्टर मनुष्योत्तर वेदवाक्य सरीखी कम्प्युटराईज्ड मोटाक्षरी
रिपोर्ट का हस्ताक्षरी।

-डाॅ. एन एस बिष्ट
8.9.19