बदल रहा देश, लेकिन नहीं बदली तो सिर्फ महिलाओं की तस्वीर।

बदल रहा देश, लेकिन नहीं बदली तो सिर्फ महिलाओं की तस्वीर


पूर्णिमा मिश्रा, देहरादून


युगों— युगों से वीर नारियों को याद किया जाता आ रहा है। माता सीता,
विद्योत्मा, गार्गी, दुर्गावती, मीरा, अहिल्या बाई, लक्ष्मी बाई, सरोजनी
नायडू, इंदिरा गांधी, विजय लक्ष्मी पंडित, रीना सत्तू, बचेन्द्री पाल और
न जाने कितनी हजार महिलओं का उदाहरण दिया जाता है। समय के साथ युग बदले
लेकिन नहीं बदली तो केवल नारियों की कहानी। नारी का जीवन ईसा से पूर्व भी
संघर्षशील था और आज भी संघर्षशील है। जिसमें कई नारियों ने अपना लोहा
मनवाया तो कई महिलाएं समाज की मानसिकता की शिकार हुई हैं। जिनको ना तो
याद किया जाता है और ना ही उनकी कहानियां देखने और सुनने को मिलती हैं।
पहाड़ की नारियों की कहानी भी कुछ इस तरह की ही हैं। मात्र चार— पांच
नारियों के अलावा हम जानते ही किसे हैं? राज्य महिलाओं की ही देन है
लेकिन महिलओं को असल मायनों में अभी तक भी वो सम्मान वो तवज्जू नहीं दिया
गया है।

कहने को तो महिलओं को पहाड़ की रीढ़ माना जाता है। जो असल मायने में सही
भी साबित हो रहा है। महिलाओं की देन ही जहां राज्य है, तो वहीं असल मायने
में राज्य के अधिकतर क्षेत्रों को महिलाएं ही चला रही हैं। क्योंकि पुरूष
समाज नौकरी की तलास में पहाड़ से भागकर मैदानी क्षेत्रों में रूख कर गया
है। ऐसे में महिलाएं ही अपने गांव— खेत खलियान और पहाड़ में जान डाले हुए
हैं। जिसके कारण आज पहाड़ जिंदा है। अधिकतर पहाड़ी क्षेत्रों में नजर
डालें तो यहां की महिलओं की स्थिति आज तक नहीं बदली है। जहां मैदानी
क्षेत्रों में महिलाओं की आंख धूप चढ़ने पर खुलती है, तब तक तो पहाड़ की
नारी घास काट कर अपने घरेलू काम भी निपटा चुकी होती है। हर सुबह 20 से
ज्यादा किलो कंधे में बोझा ढोकर न जाने कितने किलो मीटर उतार— चढ़ाव में
पैदल चल कर, पहाड़ की नारियां बिना किसी से शिकायत किए लड़ी जा रही हैं,
जो मिसाल दे रही हैं कि न उनको किसी के सहारे की जरूरत है और ना ही किसी
सरकार के योजनाओं की। वो अपने में ही खुश हैं। उनको तो अपने घास काटने,
गाय— बच्छी चराने, दो चार— छवीं लगाने से ही खुश हैं। उनको यह भी नहीं
पता कि आखिर बाहर की दुनिया कहते किसे हैं। लेकिन इन सब के बीच वो बस
सालों— साल से सिमट गई हैं। जिससे न उनकी कोई सामाजिक पहचान है और ना ही
उनकी किसी को परवाह, अब तो उनके बच्चे और पति भी उनसे दूर नौकरी की चाह
में निकल चुके हैं। जो किसी दुख में अपनी पीड़ा भी किसी को बयां भी नहीं
कर सकती। यह केवल एक नारी की नहीं बल्कि उन सभी पहाड़ की नारियों की
कहानी है जो पहाड़ में अपना जीवन यापन कर बस समय काट रही हैं।

महिला दिवस के अवसर पर हम समाज की मानसिकता और कठिन राह को एक समय में
चीर कर आगे बढ़ने वाली महिलाओं को तो बढ़ावा दे रहे हैं, उन्हें हीरो का
दर्जा दे रहे हैं। लेकिन उन पहाड़ी नारियों का क्या जो हर रोज संघर्ष कर
रही हैं। अपनों से, अपनों के लिए, और न जाने कब से। जिनको यह भी नहीं पता
कि आखिर उनकी मंजिल आखिर है क्या? बस वो जिए जा रही हैं उस परिस्थिति
में, उस आवोहवा में खुद के लिए नहीं बल्कि जिंदगी काटने के लिए।