देहरादून में दिखा इगास बग्वाल का जलवा

देवभूमि  के नाम से देश और दुनियों मंे विख्यात उत्तराखंड अपनी अनोखी संस्कृति रीति रिवाज और परंम्पराओं के लिए जाना जाता है। छोटा प्रदेश होने के बावजूद यहां पर गढवाली कुमाउंनी और जौनसारी सहित कई लोकभाषाये भी प्रचलित है। बात अगर यहां के मुख्य त्यौहारों की करी जाय तो होली दीपावली के अलावा कई ऐसे त्यौहार है जो सिर्फ उत्तराखंड मंे ही प्रचलित है। इन्हीं में से एक परम्परागत त्यौहार इगास की बग्वाल है जिसे यहां दीपावली के ठीक 11वे दिन मनाया जाता है। पर्वतीय जिलों से पलयान के कारण यह त्यौहार अब शहरों में भब्य तरीके संे मनाया जाने लगा है जिसका बीड़ा देवभूमि इगास समिति ने लिया है। इस कार्यक्रम में सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के प्रतिनिधि के तौर पर उनके औद्योगिक सलाहकार डाॅ के एस पंवार ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर सिरकत की ।

इगास बग्वाल के यूं तो पूरे उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में सदियों से प्रचलित है,लेकिन पलायन के कारण अब ज्यादातर लोगों के शहरों मे आने के कारण इसे अब यहां भी धूमधाम से मनाया जाने लगंा है। पिछले तीन सालों से इस पर्व को परम्परागत तरीके से मना रही देवभूमि ईगास समिति ने इस बार भब्य तरीके से इसका आयोजन किया ।देवभूमि ईगास समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह रावत का कहना है कि इस पर्व को मनाने मकसद पूरे विश्व में यह संदेश देना है कि उत्तराखंड भारत का माथा है और यहां पर विशेष प्रकार की परम्परायें प्रचलित है। जिसे हमने आॅन लान कर दुनियां भर में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों को सामिल किया।

इगास बग्वाल के इस परम्परागत त्यौहार को देहरादून में रहने वाले अधिकतर प्रवासिंयों ने परम्परागत तरीके से मनाया जिसमें सबसे पहले ढोल दंमाउ की थाप पर भैलों खेला गाया फिर लोकगायिका मीना राणा,धूमसिंह के गीतों पर दर्शक खूब नाचे और फिर रस्साकसी जिसे परम्परागत भाषा में ब्रततोड प्रतियोगिता कहते है उसका भी आयोजन किया गया।जिसमें महिला व पुरूषों की टीम ने प्रतिभाग किया।कार्यक्रम के दौरान पहाडी व्यंजनों के लिए प्रसिद्व गढ़भोग द्वारा लगाये गये खाने में मंडुवे की रोटी,झंगोरे की खीर,तोर की दाल,आलू का झोल आदि का लोगों ने खूब आंनन्द लिया। देवभूमि इगास समिति के सदस्यों का कहना है कि राज्य सरकार को इस त्यौहार पर अन्य राजकीय त्यौहारो की तरह अवकास घोषित करना चाहिए।

बीओ 3 इगाास की बग्वाल को मनाने के पीछ पर्वतीय जनपदों में कई लोकमान्यतायें प्रचलित है जिनमें प्रमुख रूप से कहा जाता है कि वीर भड़ माधों सिंह भण्डारी दीपावली के 12 दिंन वापस अपने घर लौटे तो इस खुशी में यह त्यौहार समूचे पहाडी जिलों में मनाया जाता है। वही दूसरी ओर मान्यता है कि जब भंगवान श्रीराम लंका विजय के बाद वापस अयोध्या लैटे और सभी जगह दीवाली मनायी गई लेकिन उत्तराखंड वासियांे को इसकी सूचना 11 दिंन बाद मिली तब से यह इगास की बग्वाल को बूडी दीवाली के तौर पर मनाई जाता है।

अनोखी लोकपरम्पराओं व संस्कृति के लिए विख्यात उत्तराखंड में इगास की बग्वाल को साल दर साल जिस भव्यता और उत्साह से मनाया जा रहा है। उससे यह लगता है कि उत्तराखंडी अपनी जड़ों को फिर से हरा भरा करने के लिए अपनी संरकृति के संरक्षण में जुट गयंे है। शुभ संकेत इस बात का है कि इन परम्परागत त्यौहारों को मनाने से आने वाली पीड़ी रूबरू होकर खुद को रोमंाचित महसूस कर रही है और अपनी सदियों पूरानी इन परम्पराओं पर गर्व भी कर रही  है। जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार को भी उत्तराखंड के सभी परम्परागत संस्कृति और त्यौहारों के संरक्षण के लिए पूर्ण सहयोग करना होगा तभी उत्तराखंड के देवभूमि होने का अस्थित्व सदैव बना रहेगा।