फिर चल पड़ी मांगल गीतों की लोक परम्परा,गीत पुराने अंदाज नया

फिर चल पड़ी शुभ कार्यो में मांगल गीत गाने की लोक परम्परा
– टोलियां बनाकर व्यवसायिक तरीके से मांगल गीत गा रही है कई महिला ग्रुप।
– मांगल गीतों को गाने की पुरानी परम्परा को पुर्नजीवित कर रहे है कई महिला दल।
– नई पीड़ी को भी खूब भा रहे है मांगल गीत।
– लोक परम्परा को पुर्न जीवित करने के साथ साथ आय का भी जरिया बन रहे है मांगल गीत।

भानु प्रकाश नेगी

देहरादूनःअपनी अनोखी संस्कृति व परम्पराओं व विरासतों के लिए देश और दुनियां में विख्यात उत्तराखंड अपने जन्म से पहले भी पलायन की मार झेल रहा है। जिसकी वजह से कही न कही यहां की संस्कृति का हा्रस हुआ है। लेकिन इस हा्रस होती संस्कृति को बचाने का प्रयास गौरागंना गु्रप की महिलाओं समेत अनेक महिला संस्थायें कर रही है। जो शादी विवाह समारोह में पुराने समय में गाये जाने वाले मांगल गीतों को गाकर इस लोकपंरम्परा व संस्कृति का पुर्नजीवित कर रहे है।

शादी समारोह में सुमधुर सुर और साजबाज के साथ मांगल गीतो को गाती महिलाओं को बहुत सुखद अहसास होता है। ये महिलायें लगातार रियाज कर और बुजुर्ग महिलाओं से मांगल गीत सुनकर व्यवसाहिक तरीके से गा रही है। मांगल गीतों को काफी समय से आकाशबाणी और लोककला के लिए काम करने वाली और ग्रुप संयोजक सरिता भट्ट का कहना कि घरेलू महिलायें अक्सर घर का काम काज निपटाकर बेफजूल की बातें करती है। लेकिन हमने अपने समय का सद्प्रयोग व संस्कृति के संरक्षण के लिए यह बीडा उठाया है।
वही इसी ग्रुप की युवा कलाकार लाजवंती रावत का कहना है कि पहले समय में कैसेटों में मांगल गीत गाये जाते थे जो शादी के समारोह पर सटीक नहीं बैठते थे तब हमने निर्णय लिया कि हम खुद इन मांगल गीतों को गायेगे,अब यह मांगल गीत काफी लोकप्रिय हो रहे है और हमारी आय का भी जरिया बन रहे है।

शादी और शुभ कार्यो में मांगल गीतों को बहुत शुभकारी माना जाता है। अब उत्तराखंडी समाज अपने पुरानी संस्कृति व विरासतों की ओर बढता दिखाई दे रहा है। भले ही वह आधुनिक और व्यवसायिक तरीके से इन सब चीजों को अपना रहे है। मांगल गीत आयोजकों को भी खूब भा रहे है और शादी समारोह में इन मांगल गीतों की टोलीयों का प्रचलन भी चल पडा है। आयोजको का कहना है कि हमें यह परम्परा बहुत अच्छी लगी हमने इसलिए मांगल गीतों को कार्यक्रम रखा है ताकि हमारी आने वाली पीडी भी अपने लोकपरम्पराओं व अपनी संस्कति से रूबरू हो सकें।

भले ही उत्तराखंड में पलायन की मार से लोकसंस्कृति व परम्पराओं के पुराने स्वरूप को खोता जा रहा हो लेकिन इन लोक परम्पराओं को समय के अनुसार अब नये अवतार में देखना एक सुखद अहसास है। पुराने समय में महिलाओं द्वारा शुभ कार्यो में गये जाने वाले मांगल गीतों ने अब व्यवसाय का रूप ले लिया है, जिससे लोककलाकरों की आय के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासतों का भी संरक्षण व सवर्धन हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि, गांव से शहरों में आये उत्तराखंडियों को अपनी परम्पराओं व संस्कृति संरक्षण के लिए खुले मन से आगे आये ताकि युवा पीड़ी अपनी जड़ों को न भूल सकें।