नागदेवता के मेले में उमड़ा श्रृद्धा का सैलाब

नागदेवता के मेले में उमड़ा श्रृद्धा का सैलाब
   म्याणी (जौनपूर)टिहरी गढवाल 
                 //भानु प्रकाश नेगी//
उत्तराखंड को यूं ही देवभूमि नही कहा जाता है। यहां के कण-कण में देवी और देवताओं का वास है। साल भर में दर्जनों बार लगने वाले मेले हमारी सांस्कृतिक विरासतों के महत्व से हमें रू-ब-रू कराती रहती है। इन्ही में से एक खास मेला टिहरी गढवाल जौनपुर क्षेत्र के म्याणी गांव में हर साल बैसाख मास की प्रतिप्रदा 21 अप्रैल को बडे धूम-धाम से मनाया जाता है। जिसमें श्रृधालओं का सैलाब नागदेवता के दर्शनों के लिए उमड़ पडता है।
समाजसेवी अनिल कैन्तुरा ने बताया कि यह मेला आज से 30 साल पहले नागराज की तपस्थली जाखधार से यहां के बुद्धिजीवियों संतराम पंवार पूर्व प्रधान म्याणी,ज्ञाना देवी कैन्तुरा म्याणी,सूरत सिंह सजवाण पूर्व प्रधान,हुक्म सिंह रमोला पूर्व प्रधान,खजान सिंह चैहान पूर्व प्रधान ढकरौला,कुवंर सिंह नेगी पूर्व प्रधान खडकसारी द्वारा शुरू किया गया था।
तय कार्यक्रम के अनुसार नागराजा की डोली ग्राम म्याणी से जाखधार मंदिर के  लिए रवाना होती है। जहां इसे दिनभर श्रृद्धालूओं के दर्शन के लिए रखा जाता है। जिसमें समय-समय पर स्थानीय लोगों द्वारा डोली को हाथ में रखकर तथा कन्धे में रख कर नृत्य कराया जाता है। लोकमान्यता के अनुसार डोली को नृत्य कराने से श्रृधालूओं की मनोकामनायें पूर्ण होती है। फिर शांयकाल नागदेवता की डोली को गद्दी स्थल के लिए रवाना किया जाता है। दूसरे दिन 9 गते बैसाख को फिर डोली को नृत्य कराया जाता है और सांय 5 बजे नियत स्थान पर विराजमान कराया जाता है।
नागदेवता के इस खास मेले के लिए स्थानीय लोग देश-विदेशों से साल भर में एक बार दर्शन के लिए जरूर आते है। लोकमान्यता के अनुसार यह क्षेत्र बद्रीनाथ,केदारनाथ,का क्षेत्र माना जाता है जिसमें यहां नागदेवता की विशेष पूजा अर्चना की जाती है।और इसका अपना विशेष महत्व है।
लोक विरासतों एवं विशेष संस्कृति के लिए अपनी खास पहिचान रखने वाला यह क्षेत्र न सिर्फ उत्तराखंड में बल्कि देश और दुनियां बहुचर्चित है। महाभारत कालीन लक्षग्रह और लाखामंडल के विशेष शिवमंदिर के दर्शन के लिए श्रृधालू देश व विदेशों से यहां आते है। वही माध महीने में “मरोज“ का त्यौहार,और एक माह तक मनायी जाने वाले “बग्वाल“ समेत कई खास त्यौहार यहां की विशेष पहिचान रखते है।