प्रो.पुष्पेश पंत के गो मांस भक्षण के बयान ने किया देवभूमि को कलंकित.


उत्तराखण्ड को सम्पूर्ण विश्व में देवभूमि के नाम से जाना जाता है। इस देवभूमि का निर्माण मानव नहीं बल्कि देवताओं ने की, जिसका उल्लेख शास्त्रों व पुराणों में उल्लेखित है। ऋषि मुनियों की तपस्थली, मां गंगा जमुना का मायका और यहां के कण-कण में देवी-देवतों का वास है।देश और दुनिया की आस्था का केन्द्र उत्तराखंड जहां पेड़-पौधों की भी पूजा की जाती है।यहां जल,अन्न,वायु को देवता की संज्ञा दी गयी है, देवभूमि की संस्कृति की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान है, देवभूमि दुनिया के आस्था का केन्द्र है। देश-दुनिया के लोग कष्टों से मुक्ति पाने के लिए अपनी आस्था के लिए बदरी- केदार के अलावा देवभूमि के मंदिरों में आते है।
शास्त्रों में देवताओं से बड़ा गाय को माना गया है क्योंकि गाय के मूत्र (गौत) से देवता शुद्ध होते है। गंगा जल के बाद गोमुत्र को सबसे जादा पवित्र माना गया है हिन्दु धर्म में गाय को  माता का दर्जा प्राप्त है क्यों इसका दूध,दही ,मख्खन,घी,और मल- मूत्र को हमारे शरीर के लिए अमृत के समान माना जाता है।शास्त्रों के अनुसार गाय के शरीर में 33 कोटि देवी देवताओं का वास होता है और दुनिया का एक अकेला जानवर है जिसका मूत्र भी पवित्रत्रा के लिए उपयोग किया जाता है, देवताओं से पहले गाय की पूजा की जाती है।हिन्दु धर्म में गाय के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि प्रथम पुज्य देवता श्री गणेश भी पूजा के लिए गाय के गोबर से ही बनाये जाते है।

हाल ही में “धाद“ संस्था द्वारा आयोजित प्रसिद्व फाटो पत्रकार स्व.कमल जोशी की श्रद्वाजलि में मुख्यवक्ता के तौर पर पधारे प्रो. पुष्पेश ने देवभूमि को उस वक्त कंलकित कर दिया जब उन्होनें अपने वक्तब्य में कहा कि कमल जोशी कुछ नहीं खाते थे पर में गाय का मांस भी खा लेता हूं यह क्षण देवभूमि पर कालिक पोतने वाला था क्योंकि प्रो.पंत उच्च कोटि ब्रहामण व विद्वान, ज्ञानी पुरुष माने जाते है,लेकिन उनके गो मांस खाने के बायान से उनकी विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है उनके इस बयान ने ब्रहामण कुल के साथ देवभूमि की संस्कृति व आस्था को ठेस पहुंचाने का काम किया है। उनके इस बयान से देवभूमि के अस्तित्व पर प्रशन चिन्ह लग गया है। हैरानी की बात यह है कि है “धाद” जैसी प्रसिद्ध सामाजिक व साहित्यिक संस्था के वृहद कार्यक्रम में जब प्रो.पंत ऐसा कह रहे थे तब आयोजक मंडल से लेकर मंचासीन तमाम अतिथि मौन बैठे थे। जो”धाद” जैसी संस्था पर प्रश्न चिन्ह है ? उतरा बहुगुणा को विश्व स्तर का मुद्दा बनाने वाले अति सामाजिक लोग जो सोशल मीडिया पर अति सक्रिय हो गये थे उन्होने देवभूमि व ब्राहमण कुल पर दाग लगाने वाले प्रो पंत की कोई निंदा नही की जबकि हिमालय डिस्कवर व चैनल नेपाल के बरिष्ठ पत्रकार मनोज ईष्टवाल ने इस खबर को प्रमुखता से छापने का अदम्य सहास जुटाया।


 

 भले ही प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस मुद्दे को गम्भीरता से नही लिया हो लेकिन सोशल मीडिया पर यह मुद्दा अभी भी गरमाया हुआ है।इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों से लेकर आम आदमी तक आक्रोश में है।

वरिष्ठ लेखक व पत्रकार डॉ विरेन्द्र वर्तवाल ने इस मुद्दे को अपनी फेसबुक वॉल पर प्रमुखता से उठाया है।डॉ वर्तवाल ने इस तरह अपने फेसबुक वॉल पर इसकी घोर निंदा की है। उत्तराखण्ड में एक बात चर्चा में है कि,प्रो.पुष्पेश पंत ने कहा कि वे गोमांस खाते है।तो पंत जी से सवाल है कि,यह बताने की आवश्यकता क्या थी?वह भी एक फोटो जर्नलिस्ट कमल जोशी की स्मृति में।आयोजित धाद जैसी साहित्यिक कार्यक्रम में।लगे हाथ आप यह भी बता देते कि आप घर में और क्या-क्या करता? वैसे आपका यह बताने का मकसद क्या था यह तो सभी लोग समझ गये होंगे, आप को यह भी पता रहा होगा कि जहॉ पर आप इस बात का खुलासा कर रहे हैं।उन लोगों से इससे क्या मतलब इनमें से कितने लोगों को यह चीज पंसद है। अगर आपने किसी को चिढाने और खुद को धर्मनिरपेक्ष,(पथनिरपेक्ष) जताने के लिए यह बात कही तो आप जैसे लोगों को एसे मंचों पर जगह नहीं मिलनी चाहिए और खास तौर से देवभूमि उत्तराखण्ड में तो बिल्कुल भी नहीं। अगर एसे लोग समाज में विद्धान कहलाते तो मुझे एसे विद्धवता पर घृणा है।

डॉ विरेन्द्र बर्तवाल के फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में लोगों ने इस तरह निंदा की-

  • जितेन्द्र प्रसाद अंथवाल लिखते हैं की प्रो.पंत को मैं भी उत्तराखण्ड की बडी सख्सियत समझता था , मगर लगता है उन्हें भी असहिष्णुता का राग अलापते हुए दो साल पहले छाती पीट चुके पुरस्कार लौटाउ गैंग के सदस्य मंगलेश डबराल वाली बीमारी लग गयी डबराल भी थे पंत के साथ मंच पर ।
    मनोज जोशी ने लिखा है कि पुष्पेश पंत़ ब्रहामणों के नाम पर कलंक है।
    -विजय कुमार नौटियाल लिखते हैं की अति निदंनीय एसे लोग हिन्दु धर्म पर कलंक है।
    -इस मुद्दे पर फेसबुक पोस्ट में अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले भी गोमांस के समर्थन में दिखाए दिए। मनोज इष्टवाल के फेसबुक वाली पोस्ट पर प्रसिद्ध गढवाली भाषाविद् भीष्म कुकरेती लिखते हैं कि गोमांस पर इतना रबड-गबड क्यों मैंने भी यूरोप में जान बूझकर बीफ सैंड विच खाया तो क्या हुआ ।

  • -भीष्म कुकरेती की इस टिप्णी का जबाब देते हुए शशि कांत डबराल ने लिखा भीष्म कुकरेती जी आपके माथे पर चमकता यह लाल तिलक संभवत आपने सौंदर्य प्रसाधन के रुप में लगाया हो मगर संनातन धर्मावल्बियों के लिए वह एक आस्था का प्रतीक है और उसी रुप में देखा जाएगा । आप गोमांस भक्षण करके गौरवांनित महसूस कर सकते हैं मगर अपनी गोरवगाथा का ढिंढोरा पीट कर आप हिन्दुओं का अपमान ही कर रहे हैं। इन प्रतिवादी गोमांस भक्षकों के दोगलेपन के कारण ही सदियों से ये देश गुलाम रहा है । और आगे भी रहेगा ये लाल तिलक लगाकर गोमांस का भक्षण से गौरवांन्वित होना दुखद है ।
  • -इस बयान पर विश्वप्रसिद्ध कथावाचक व्यास आचार्य शिवप्रसाद मंमगाई कहते हैं पंत कुमाऊ के उच्च कोटी के ब्रहामण होते हैं और पंत जी ने यदि एसा बयान दिया तो एसे लोगों का देवभूमि में आने का कोई अधिकार नही हैं इनका सार्वजनिक बहिस्कार होना चाहिए धाद जैसी संस्था जो एक सामाजिक संस्था है इस मंच से यह बयान दिया गया और मंच पर बैठे लोग चुप रहे हैं इससे बडे दोषी यह है। महाभारत में कहा गया की अपराध करना तो पाप है पर अन्याय सहना इससे बडा पात है।गाय को देवतों से बड़ा माना गया और पंत जी एसे कहते हैं तो हम इसकी कडी निंदा करते हैं और किसी भी कार्यक्रम आये अतिथियों को आयोजन कर्ताओं को विषय बताना चाहिए की इस विषय पर बोलना है ।

  • -इस बयान पर समाजसेवी व हिल्स डेवलमेंट मिशन के अध्यक्ष रघुवीर सिंह बिष्ट कहते हैं की प्रो पुष्पेश को इस तरह का विवादित बयान नहीं देना चाहिए था जिससे देवभूमि के लोगों की आस्था पर ठेस पहुंचे।
    इस पर आचार्य जय कृष्ण अंथवाल कहते हैं की में इस बयान की घोर निंदा करता हूं बिना गाय की गति नहीं है हम गाय को पशु नही बल्कि माँ मानने के लिए तैयार हैं ।
    समाजसेवी स्वामी दर्शन भारती का कहना है की हम देवभूमि के अस्तित्व को बचाने के लिए बहार के लोगों से लड रहे हैं पर देवभूमि को कंलकित करने का काम पुष्पेश पंत जैसे लोग देवभूमि में आकर कर रहे है जो घोर आपत्तिजनक है।
  • देवभूमि की पवित्र धरा से पुष्पेश पंत का गो मांस भक्षण का बयान उनकी विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगा गया,साथ ही करोडों हिन्दुओं की आस्था व विश्वास को गहरा धक्का लगा है। धाद जैसी प्रतिष्ठित संस्था के कार्यक्रम में उनके द्वारा दिया गया यह बयान संस्था की प्रतिष्ठा पर गहरा प्रश्न चिन्ह लगा गया।