पाठ्यक्रम में सामिल करने से संरक्षित होंगे लोक परंम्परागत जागर-पद्श्री बसंती बिष्ट

उत्तराखंड के परम्परागत धरोहर और हमारी अमूल्य धरोहर माने जाने वाले जागरों की पुरातन शैली पर लगातार संकट के बादल मंडरा रहे है।पर्वतीय जिलों से पलायन के कारण परंम्परागत लोक गीत जागर,व नृत्य विलुप्ति की कागर पर पंहुच चुके है। वहीं अपनी परम्परागत जागर शैली के लिए विश्व विख्यात पद्मश्री बसंती बिष्ट अपने अथक प्रयासो से इन जागरों,पुराने लोेेेेेेेकगीत व नृत्य को संरक्षित करने के लिए लगातार संर्धषरत है।
पिछले एक माह से सोनचिरैया एवं ओएनजीसी द्वारा प्रस्तुत जागर एवं संस्कार गीत की निःशुल्क कार्यशाला का आयोजन बंसती बिष्ट के द्वारा किया गया,जिसका समापन डिफेंस कॉलानी के सभागार में भब्य तरीके से किया गया,कार्यक्रम में सभी प्रशिक्षुक परंम्परागत भेश भूषा में नजर आये और एक माह तक लिए गये प्रसिक्षण की रंगारंग प्रस्तुतियां प्रस्तुतियां दी गई।

पद्मश्री बसंती बिष्ट ने बताया कि कार्यशाला में मुख्य तौर पर गढ़वाली कुमाउंनी मंगल गीत,जागर,परम्परागत गीत,पर्यावरण के गीत,उत्तराखंड की बंदना आदि सिखाई गई है।क्योंकि बच्चों ने पहली बार संगीत सिखना शुरू किया है इसलिए कठिन जागर वो अभी नही सिख पायेगें,इसके अलावा बच्चों को अतिथि देवो भवः व भाई चारे सौहार्द के बारे में भी सिखाया गया।जागर हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम होने आवश्यक है साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में जागर के जानकारों को कम से कम एक घंटा बच्चों को सिखाना होगा जिसके लिए सरकार का सहयोग आवश्यक है।बडां के बजाय बच्चों का जागर व मांगल गीत सिखाना आवश्यक है, हमने प्रशिक्षण के दौरान बच्चों को जागरों के भावार्थ भी सिखाये है।उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक मेले ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होने चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को परम्परागत संस्कृति के अलावा रोजगार भी मिल सके।मेले हमारी आर्थिकी का स्रोत होने चाहिए। साथ ही राज्य सरकार को अन्य प्रदेशो की तरह संस्कृति संरक्षण के लिए विशेष सहयोग की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में प्रशिक्षित बच्चों ने बताया कि उन्हें लोक संगीत के बारे कुछ भी पता नही था लेकिन बसंती बिष्ट द्वारा सिखाये गये लोक संगीत व जागरों से बहुत कुछ सिखने को मिला है। हमारी लोक संस्कृति विलुप्त होती जा रही है हम अगर प्रयास करेगें तो इसे रोका जा सकता है।

भानु प्रकाश नेगी,देहरादून।