पल्टन बाजार में अतिक्रमण पर शासन प्रशासन मौन क्यों ?

अति व्यवस्तता और भीड-भाड़ वाले पल्टन बाजार में व्यापारियों के पैदल मार्ग पर कब्जा पर प्रसाशन ने पहले ही आंखे मूद रखी है। अधिकतर व्यापारियों ने अपनी अपनी दुकाने के सामने वाली सड़को पर भी कब्जा किया हुआ है। और उस पर फड और ठेली चलाने वाले लोगों को किराये पर दे दिया है। हर बार कार्यवाही के नाम पर शासन और प्रसाशन द्वारा र्सिफ दिखावा ही किया जाता है। आम जनता को होने वाली परेसानियों पर जमीनी तौर पर कभी भी ध्यान नही दिया जाता है।


अतिक्रमण का न हटना अकसर सत्ताधारी पार्टी और रसूकदार नेताओं का दवाब माना जाता है। पिछली सरकार में एसएसपी केवल खुराना द्वारा पल्टन बाजार मे अतिक्रमण के खिलाप कार्यवाही करने और पीक समय में वाहनों की पाबंदी पर व्यापारियों द्वारा जमकर विरोध किया जाना इसका जीता जागता उदाहरण है। साथ ही व्यापारी नेताओं का बडी राष्ट्रीय पार्टीयों के साथ सबंध होने के कारण यह मुहिम परवान नही चड पायी। दूसरी ओर सीओं सीटीं ट्रैफिक धीरज गुंजियाल का कहना है कि पल्टन बाजार के व्यापारियो सें अतिक्रमण में सहयोग की बात करना बेमानी है। अतिक्रमण की आड़ में यहां पर हर प्रकार के अपराध जन्म ले रहे है। जिसमें चैन स्नैचिंग,स्मैक,और व्यापारियों की ग्राहकों पर दादागिरी, आदि सामिल है।
कभी देहरादून की शान कहे जाने वाले पल्टन बाजार की हालत वर्तमान समय मे क्या है यह किसी से छुपी नही है। अबैध रूप से चल रहे अतिक्रमण के कारण यहां से गुजरने वाले आम आदमी को परेसानियों का सामना करना पड रहा है। प्रसासन की अनदेखी और राजनीतिक दबाव के कारण यहां के व्यापारियों के हौसले बुलंदियों पर है। जिसके कारण यहां ग्राहकों को मनमाने रेट पर समान बेचा जाता है और पंसद न आने पर वापसी के लिए कई नियम और शर्ते लागू की जाती है।


आखिर कब तक शासन प्रसाशन पल्टन बाजार के अतिक्रमण पर खामोश रहेगा? कब तक यहां हो रहे अपराधों को सह मिलती रहेगी? और कब तक आम जनता व्यापारियों के शोषण का शिकार होते रहेगें? इन सब सवालों का जवाब कौन देगा यह अपने आप में एक बडा़ यक्ष प्रश्न है।

-भानु प्रकाश नेगी