आखिर कब बनेगा सपनों का उत्तराखंड?

पहाड़ से पलायन करने का दर्द उत्तराखण्ड़ के लोक गीतो में भी महसूस किया जा सकता हैं। प्रसि़द्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने पलायन की व्यथा को कुछ यूं बयां किया हैं- न दौड़ न दौड़, तौं उंदरियूं का बाठा, उंदरियूं  का बाठा,,,,,,,,,,,
उत्तराखण्ड़ राज्य गठन के आज 19 साल पूरे हो गए हैं। जिन हको और सपनों को लेकर उत्तराखण्ड़ अलग हुआ था उस में हक तो पूरा मिले लेकिन सपने एक के बाद एक टूटते गये। राज्य गठन के लिए कितनी कुर्वानियां हुई कितने लोगों ने अपनी जान दी तब जाके उत्तराखण्ड़ बना। लेकिन जिन मुद्दो के लिए राज्य का निमार्ण हुआ था, उन मुद्दां को तो उत्तराखण्ड़ राज्य के लिए शहीदों  के साथ ही खत्म कर दिया गया। ना तो राज्य का पलायन रूका हैं और न ही राज्य में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। पहाड़ी जिलों में हो रहे पलायन का कारण मूलभूत सुविधाओ का आभाव है, लेकिन सरकार इतना करने में भी नाकाम रही हैं।  सच तो ये हैं कि उत्तराखण्ड़ में पलायन अब समस्या नहीं बल्कि एक अभिशाप बन हैं। उत्तराखण्ड़ को एक पहाड़ी राज्य का दर्जा हैं, लेकिन खाली होते गांव के गांव इसकी वर्तमान दिशा को बयां करने के लिए काफी है।  19 वर्षो में राज्य आंदोलनकारियों की भावना के अनुरूप न तो गैरसैंण राजधानी बनी, न ही पलायन रूका। पलायन का दंश पहले जितना था उससे कही अधिक पहुंच गया। अपने घरों और पुस्तेनी जमीनो को छोड़कर जाने की ये उत्तराखण्ड़ की एक भयानक सच्चाई हैं । अगर यही हालत रहे तो आने वाले कुछ वर्षो में उत्तराखण्ड़ 4- 5 जिलों (नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, हरिद्धार, देहरादून आदि) में सिमट कर रह जायेगा। उत्तराखण्ड़ में जंक लगे ताले, टूटे मकान पहाडो की ये कहानी दशको से बयां करते आ रहे है। कहावत है कि पहाड का पानी पहाड़ की जवानी, कभी पहाड़ के काम नही आती, ये अब सच हो रहा हैं,यहां गांवों में महज बूढ़े लोग ही मजबूरन रूके हुए हैं। परिवारों के पलायन के बाद पहाड़ो पर देवी-देवताओं के मूल स्थान भी संकट में हैं। पूजा स्थानों में सुबह-शांम दीया जलाने को भी लोग नही हैं। जहां पहले लोग साल में एक बार देवी- देवताओं को पूजने अपने मूल गांव आते थे लेकिन अब यह प्रवृत्ति भी खत्म होती जा रही हैं।।
इसकी वजह गावं में बचे कुछ परिवारों का भी पलायन कर जाना हैं। गांव छोड़ने के बाद देवी- देवताओं को विस्थापित करना लोगो की मजबुरी हो गयी हैं। उत्तराखण्ड़ को एक अलग राज्य बनाने के लिए सैकड़ो कुरबानी देनी पडी थी। अलग राज्य तो बन गया पर उसके बाद पलायन का शिलशिला थमा नही हैं। उत्तराखण्ड़ में बीरान हुए गांवों को जिसने भी एक बार छोड़ा उसने दोबारा गांव वापस जाने की तरफ कदम नहीं बढ़ाये। युवा पीढ़ी रोजगार और शिक्षा के लिए दूसरे शहरो का रूख कर रहे हैं और वही रच बस जा रहे हैं। उत्तराखण्ड़ में पलायन अब इस हद तक पहुंच गया कि गांव तेजी से वीरान होते जा रहा हैं। पलायन करने में सबसे ज्यादा बेरोजगार युवा हैं। पलायन की वजह कही न कही 2013 जून की आपदा भी रही। जिसने ग्रामीणों को घर छोडने पर विवश किया हैं। पहाड़ी गांव में वो ही लोग बचे हैं जो पलायन करने में सक्षम नही हैं। राज्य गठन के बाद से लगभग 20 लाख लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं जिसमे हर साल 30 हजार लोग पलायन करते हैं। यह हालत तब थे जब 2013 की आपदा भी नही आयी थी। आपदा के बाद तो पलायन और अधिक बढ़ गया। उत्तराखण्ड़ से हर दिन 33 लोग पलायन करते हैं। पलायन होने का मुख्य कारण बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव हैं। पर्वतीय जनपदो से मूलभूत सुविधाओं का अभाव होने से लोग पलायन करने लगे हैं। जिसमें 48 फीसदी रोजगार करने वाले होते हैं। पलायन रोकने के लिए वर्तमान राज्य सरकार ने 17 सितम्बर 2017 को पलायन आयोग का गठन किया था ।

2018 में आयोग द्धारा पहली रिर्पोट रखी गयी, जिसमें 2011 की जनगणना के आकंडो में 1034 गांव खाली हो चुके थे। जो 2018 तक 1734 गांव ऐसे है जहां कोई इंसान नही रहता था। राज्य के सभी 13 जिलो में 3.36 लाख घरों में अब कोई नही रहता हैं। 70 प्रतिशत लोगो ने राज्य के अन्दर ही पलायन किया हैं। उत्तराखण्ड़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चैपट हो गए। गांव मात्र एक हिल स्टेशन रह गए। पहाड़ो में भी सारी आर्थिक गतिविधियां  चार धाम यात्रा मार्ग, जिला, तहसील और ब्लॉक मुख्यालय के छोटे- बड़े नगरो तक ही सीमित हैं। अति संवेदनशील भारत- तिब्बत सीमा हो या भारत- नेपाल सीमा इन सभी से सटे गांव साल दर साल खाली होने लगे हैं। पहाड़ो से लोग अब शहरो की तरफ पलायन करने लगे हैं तो वहीं सभी जंगली जानवर पहाडों का रूख करने लगे हैं। गांव का ठण्डा पानी, ताजी हवा सब छोड कर शहरों की प्रदूषण हवा में रहने के लिए मजबूर हो गए हैं। जिन पुरखों ने यहां घर, मंदिर बनाए उनको छोड़ कर देश- विदेश में जा कर किरायों के मकानों में बस रहे हैं। हमारी सरकार पलायन रोकने को बड़े- बड़े बोल बोलती हैं । वही सभी मंत्री,विधायक मैदानों में बैठ कर पलायन रोकने की योजना बना रही हैं। अगर राज्य की स्थायी राजधानी पहाडों में बनायी जाए तो पलायन रूक सकता है। उत्तराखण्ड़ का भविष्य तो काफी उज्ज्वल हैं अगर राज्य का नेतृत्व सही हाथों में हो और आम जनो का जन सहयोग हो तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता हैं । अब चुनौती हैं ,,गांवां को फिर बासने की,,,, युवाओं को अधिक सक्षम बनाने की और उनके मजबूत हाथो को काम सौपने की। मातृ शक्ति की ताकत को पहचाने और उसके सही दिशा में उपयोग करने की। गांवो में हो रहे पलायन को रोकना और उन्हें फिर से आबाद करना हैं।

-नमिता बिष्ट