हमें अपनी नदियों को बचाना होगा: सद्गुरु जग्गी वासुदेव

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सद्गुरु जग्गी वासुदेव सिर्फ संत, विचारक, दृष्टा या पथ-प्रदर्शक नहीं हैं, वे वर्तमान समय की सच्चाइयों को परत-दर-परत समझने और उनकी चुनौतियों से जूझने के हिमायती भी हैं। किसी आश्रम में बैठकर भक्तों को उपदेश देने की बजाय वे अगली पंक्ति से नेतृत्व के हिमायती हैं। देश की क्षरणशील नदियों की रक्षा के लिए उन्होंने महाभियान ‘रैली फॉर रिवर्स’ आरंभ किया है, जिसका समापन दो अक्तूबर को नई दिल्ली में होगा। नदियों की अस्तित्व-रक्षा के इस यज्ञ में कई दिग्गज राजनेता, समाज सेवक, संत, साहित्यकार आदि भाग लेंगे। नई दिल्ली में पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर ने उनसे लंबी बातचीत की:

शशि शेखर : ‘रैली फॉर रिवर्स’ एक अनोखा आइडिया है। आपको इसकी प्रेरणा कैसे मिली?
सद्गुरु : नदियों, पहाड़ों और वनों से मेरा नाता बचपन से रहा है। मुझे स्मरण है, मैं 12 से 17 वर्ष की आयु तक प्रतिदिन कावेरी नदी में तैरता था, परंतु अब उस स्थान पर, जहां मैं प्राय: तैरा करता था, आप पैदल चलकर एक से दूसरे किनारे तक जा सकते हैं। आपको आश्चर्य होगा, मैंने 17 वर्ष की अवस्था में कावेरी पर 163 किलोमीटर, बागमंडला से मैसूर तक, राफ्टिंग की थी… मात्र ट्रक की चार ट्यूब और बांसों के सहारे। यह केवल एक साहसिक संस्मरण नहीं है, बल्कि यह नदियों के साथ मेरे जीवन के गहरे संबंधों को दर्शाता है।
जब आप नदियों से गहराई से जुड़ जाते हैं, तो आपको महसूस होता है कि नदियां सजीव प्राणी के समान होती हैं। ये जीवन से परिपूर्ण हैं। इनका अपना चरित्र होता है, परंतु वर्तमान समय में नदियां दयनीय स्थिति में हैं। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि नदियों की इस दुर्दशा पर हमने आंखें क्यों मूंद रखी हैं? आप जानते ही हैं, पिछले 12 वर्षों में लगभग लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली। किसानों की आत्महत्या के कारणों पर हम सफाई देते हैं कि टमाटर के दाम बढ़ने के कारण उन्होंने आत्महत्या की। बैंक के कर्ज के कारण किसानों ने आत्महत्या की…

शशि शेखर : यह भी कहा जाता है कि अधिक वर्षा के कारण किसानों ने आत्महत्या की…
सद्गुरु : हमें किसानों की आत्महत्या के मूल कारणों को समझना होगा। मूल कारण हैं, मिट्टी का क्षीण होना और जल का अभाव। जलस्रोतों और कृषि योग्य भूमि की गुणवत्ता के क्षीण होने से खेती करना अत्यंत दुष्कर हो गया है। आप देखिए, एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत जैसे देश में लोगों के लिए खाद्यान्न पैदा करना, अन्न की आपूर्ति करना, हमारे देश के किसानों की सबसे बड़ी उपलब्धि है। आजादी के बाद देश में व्यापार को बढ़ावा दिया गया, औद्योगीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास हुए, हम मंगल ग्रह पर पहुंच गए। यह सब सराहनीय है। परंतु जब हम देखते हैं कि बिना किसी बडे़ आधारभूत ढांचे के, बिना किसी आधुनिक टेक्नोलॉजी के, सिर्फ पारंपरिक संसाधनों और जानकारियों के बल पर हमारे किसान पूरे देश के लिए अन्न का उत्पादन कर रहे हैं, तो हमें लगता है कि किसानों की यह कामयाबी देश की महानतम उपलब्धि है। बदलती परिस्थितियों में किसानों के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। यही कारण है कि हमने ‘प्रोजेक्ट ग्रीन’ की शुरुआत की। हमारे संस्थान द्वारा तमिलनाडु में लगभग तीन करोड़ 20 लाख पेड़ लगाने का कार्य पूरा किया जा चुका है, पर इतने मात्र से समस्या का हल नहीं होने वाला। स्थिति में सुधार के लिए सरकारी स्तर पर सख्त कदम उठाते हुए जरूरत इस बात की है कि प्रभावशाली नीति बनाई जाए। पानी की समस्या बड़ी गंभीर है। इस समस्या की भयावहता का आभास तब होता है, जब हम देखते हैं कि सन 1947 में जितना जल उपलब्ध था, उसका मात्र 22 प्रतिशत हिस्सा ही आज बचा है। सन 2020-25 तक यह मात्र सात प्रतिशत रह जाएगा। अगर जरूरी उपाय नहीं किए गए, तो वर्ष 2025-30 तक हमें सामान्य जीवन जीने के लिए जितने जल की आवश्यकता है, उसका मात्र 50 प्रतिशत ही उपलब्ध हो पाएगा। ‘रैली फॉर रिवर्स’ नदियों को बचाने के लिए किया जा रहा हमारा एक प्रयास है।

शशि शेखर : सद्गुरु, आपकी तरह मुझे भी सौभाग्य मिला, गंगा के किनारे पैदा होने का। मेरा भी बचपन गंगा के किनारे गुजरा। जब मैं प्रदूषित होती गंगा को देखता हूं, तो बहुत दुखी होता हूं। हम सांस्कृतिक और पारंपरिक दृष्टि से हमेशा नदियों से जुड़े रहे हैं। हम उनको मां बुलाते हैं। एक ऐसा देश, जिसकी संस्कृति नदियों से जुड़ी हो, वहां ऐसा क्यों हुआ? कारण क्या था इसका?
सद्गुरु : एक मूल कारण, जो हमें समझना होगा, वह यह है कि नदियों के प्रति लोगों के मन में चाहे जितनी गहरी भावनाएं या आस्थाएं हों, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ये भावनाएं मन की मन में ही रह जाती हैं। लोग अपनी भावनाओं को सकारात्मक रूप से क्रियान्वित करने का प्रयास नहीं करते।  मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता। हमारा सरकारी तंत्र, जो योजनाएं बनाता है और जिम्मेदार पदों पर बैठे हमारे इंजीनियर केवल यही सोचते हैं कि हम नदियों का दोहन कैसे करें? उनके पोषण की दिशा में संभवत: अब तक सोचा ही नहीं गया। दुर्भाग्य से तथाकथित आधुनिक विज्ञान का भी यही रवैया रहा है। लोग सिर्फ यही देखते हैं कि नदियां हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकती हैं? हाथी से लेकर परमाणु तक के विषय में लोग यही सोचते हैं कि इनका अधिक से अधिक उपयोग कैसे किया जाए? हम संसाधनों का दोहन ही कर रहे हैं, उनके पोषण के बारे में नहीं सोच रहे, उन्हें समृद्ध बनाने का प्रयास नहीं कर रहे।

शशि शेखर : आपने राजकीय नीतियों की बात कही सद्गुरु। क्या नदियों को एक-दूसरे से जोड़ने की सरकारी योजना कुछ काम आएगी?
सद्गुरु : हमें देखना है कि हम नदियों का उपयोग किस प्रकार करते हैं? हमारी अधिकांश नदियां अब सदानीरा नहीं रह गईं। विगत 15 वर्षों में कई नदियों का अस्तित्व मौसम पर आधारित हो गया है। कावेरी नदी साल में लगभग तीन से साढे़ तीन महीने समुद्र तक नहीं पहुंच पाती। कावेरी का दायरा तमिलनाडु में 430 किलोमीटर का ही है। कृष्णा साल में चार महीने नन्ही नदियों को नहीं छू पाती। नर्मदा भी समुद्र तक नहीं पहुंचती। लगभग तीन साल से यह देखा जा रहा है कि गंगा नदी में भी कहीं-कहीं जल के दर्शन नहीं होते। हमें यह समझना होगा कि नदियों में भी जीवन होता है, जिसके लिए उनका संरक्षण जरूरी है। हिन्दुस्तान में जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें तमाम ऐसी हैं, जिनके लिए जल का होना बहुत जरूरी है। मछलियों की हजारों ऐसी प्रजातियां हैं, जो स्वच्छ जल में ही रहती हैं। यह कोई नहीं जानता कि पिछले 20 वर्षों में जल में रहने वाले जीवों की कितनी प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं, क्योंकि इस संदर्भ में विधिवत अध्ययन ही नहीं किया गया। जल में रहने वाली अनूठी प्रजाति डॉल्फिन बहुत मुश्किल से दिखाई देती है। घड़ियालों की प्रजातियां खतरे में हैं। जलचरों के अस्तित्व की रक्षा के लिए जरूरी है कि नदियां 12 महीने बहती रहें। हमें समझना होगा कि हम नदियों का कैसे उपयोग कर रहे हैं, उनका किस सीमा तक उपयोग करें और उनके स्रोतों की वृद्धि कैसे हो? भारत की नदियों में पाए जाने वाले जल का चार प्रतिशत ही ग्लेशियरों से आता है, शेष सभी नदियां वनों पर आधारित हैं। भारत में औसतन 40-45 दिन वर्षा होती है। जब 40-45 दिन वर्षा होती है, तो यह जरूरी है कि वर्षा का जल पृथ्वी के अंदर जाने के लिए पर्याप्त वन्य क्षेत्र हो। जंगल न होने से ही वर्षा का जल धरती में न समाकर धरती के ऊपर बहने लगता है, जिसके दुष्परिणाम बाढ़ और सूखे के रूप में सामने आते हैं। ‘इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स’ इस दिशा में अच्छी योजना है।

शशि शेखर : मैंने न्यूयॉर्क में एक कहानी सुनी थी कि हडसन नदी की स्थिति कभी बहुत खराब हो गई थी। इस पर वहां की ‘सिविल सोसायटी’ उठकर खड़ी हुई। हडसन के लिए लोग गीत गाने लगे और आज हडसन पूरी तरह स्वच्छ है। हमारे यहां तो वैसे ही नदियों के बारे में गीत गाए जाते हैं। आपको लगता है, वैसा कुछ आंदोलन बनेगा देश में?
सद्गुरु : 
हमने नदियों के लिए शक्तिशाली मंत्र तो लिखे हैं, पर केवल गीत गाना पर्याप्त नहीं, हमें इस दिशा में कर्म करना होगा। न्यूयॉर्क में एक स्थान पर 1997 में जलशोधन संयंत्र लगाने की योजना बनी। इस योजना पर 80 से 90 लाख डॉलर का खर्च आ रहा था। परंतु इसके स्थान पर वहां 15 लाख डॉलर खर्च करके पेड़ लगाए गए और आज भी न्यूयॉर्क में वह एक ऐसा स्थान है, जहां के लोग बिना फिल्टर किया हुआ पानी पी सकते हैं। मुझे याद है कि जब हम बड़े हो रहे थे, तो उस समय बिना हिचके नदियों का पानी पी लिया करते थे। आज हमारी मजबूरी है कि गंदे पानी का शुद्धिकरण करके उसे पीने योग्य बनाना पड़ रहा है। हम प्रदूषण के कारण गंगा-जल को पीने की हिम्मत नहीं कर पाते। स्थिति यह है कि आज गंगा-जल में, जो अंतिम समय में दो बूंद मुंह में डाला जाता है, बड़ी मात्रा में नाले का पानी मिल गया है। वैसे प्रदूषण से निपटना कठिन नहीं है, इसके लिए केवल सूझ-बूझ से तैयार की गई नीतियों और उन पर ईमानदारी से अमल करने की जरूरत है।

शशि शेखर : दिल्ली में चार महीने सूरज ढंग से नहीं दिखाई देता। क्या प्रकृति के अन्य तत्वों के लिए भी कुछ इसी तरह का काम आप लोग करेंगे?
सद्गुरु : 
देखिए, यह सही है कि दिल्ली वालों को सूर्य की शुद्ध रोशनी नहीं मिलती। दिल्ली वाले कहते हैं कि ऐसा खेतों में पराली जलाने से होता है। वाकई, यह खेती की जमीन के साथ होने वाली भयावह निर्ममता है। हमें इसे समझना होगा। मैं एक और बात का उल्लेख करना चाहूंगा। अगर हम एक           एकड़ भूमि में 10 टन गन्ना उगाते हैं, तो इसका मतलब है कि हम काफी ऊपरी मिट्टी को हटा देते हैं। भारत में औसतन 15 से 16 इंच ‘टॉप सॉयल’ है। इनमें से उपज के लिए केवल छह-सात इंच ही उपयोगी है। पर हर साल हम देश भर में 1 से 1.5 मिलीमीटर मिट्टी की उपयोगी परत को क्षीण करते हैं। अगर इस ओर ध्यान न दिया गया, तो भला कितने दिन हम अपनी कृषि-भूमि को बचा पाएंगे?