बंदरों का आतंक

भानु प्रकाश नेगी


आस्था भी आपको मुस्किल में डाल सकती है,यह कभी सोचा भी नहीं भी नहीं गया है।लेकिन आज वह समय आ गया है जब आस्था के आड़े आने से देवभूमि में बंदर जैसे उद्ण्ड जानवर ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। शहर हो या गांव हालत इतने खराब है कि अब सड़कों से लेकर घर के अंदर तक बंदरों ने लोगों में आंतक फैलाया हुआ है। क्या है पूरा मामला देखते है इस रिपोर्ट में
बी ओ 1 यूं तो जंगली जानवरों के आंतक की कहानी उत्तराखंड जैसी पहाड़ी राज्य में कोई नई नहीं है। कभी तेदुए का आंतक तो कभी भालू का हमला यह आम बात हो गई है।लेकिन बंदरों के आंतक ने अब इस कदर बड़ गया है कि क्या गांव क्या शहर हर जगह बंदरों का आंतक मचा हुआ है। क्लमेंट टाउन निवासी सुशीला गुसाई का कहना है कि बंदर कहां से हमला कर दे पता ही नहीं चलता मुझ पर चार बार हमला कर चुके है। जब हम यहां आये थे तब हमने इनकी संख्या 4 देखी थी लेकिन आज के समय में इनकी संख्या हमारों की तादात में पंहुच चुकी है।

वहीं बंदरों के आतंक से पीडित सामाजिक कार्यकर्ता जयपाल का कहना हैं। कि हम इस समस्या को कई बार जन प्रतिनिधियों को बता चुके है लेकिन इसके समाधान के लिए कोई बात नहीं करता हैं यह आज के समय में राष्ट्रीय आपदा बन गई है।इस विषय पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

बंदरों की संमस्या दिनों दिन खतरनाक होती जा रहीं है, इस विषय पर जन प्रतिनिधि स्यंम स्वीकारते हैं कि मैने चुनाव के समय इस समस्या के समाधान के लिए जनता से बादा किया था। लेकिन वन महकमा और शासन प्रशासन इस विषय पर कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है।

बंदरों की समस्या पर बन विभाग समस्या के समाधान की बात तो कर रहा है लेकिन अभी तक धरातल में कुछ खास नहीं दिखाई दे रहा है। वन विभाग के मुखिया जयराज की माने तो उत्तराखं डमें हिमाचल की तर्ज पर हमने बंदरों की नसबंदी शुरू कर दी है।जिसमें अभी तक 5 हजार बंदरों की नशबंदी कर दी है।साथ ही हम बंदरों के लिए बडे बडे बाडे बनाने की का काम चल रहा है। जिसमें बंदरों को नेचरल तौर पर रखा जायेगा।

बंदरों समेत जंगली जानवरों के आतंक का असर पहाडी जिलों की कृषि पर भी साफ तौर पर देखा जा रहा है। इस पर कृर्षि मंत्री कहना है कि जब से मानव जाति पैदा हुई है तब से वाईड लाईफ है। जहां पहले पूरा गांव खेती करता था वहां अब 10 प्रतिसत लोग खेती कर रहे। हम सामूहिक खेती के तहत एक गांव एक खेत कर काम कर है।

जंगली जानवरों और मनुष्यों के बीच संर्धष लगतार बड़ता जा रहा है। इसे एक प्राकृतिक असंतुलन भी कहा जा सकता है। लेकिन बंदरों के नियंत्रण के मामले में आस्था भी एक अवरोध बनी हुई है।जिसके कारण इनकी तादात में भारी वृद्वि देखने को मिल रहीं। वन महकमा वंदरों को नियंत्रण करने की बात तो करता है लेकिन अभी तक धरातल में कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।